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10 Famous Jain temples in India | भारत के सबसे प्रसिद्ध जैन मँदिर!

About Shri Virendra Ji Dhakad

समाजरत्न श्री वीरेन्द्रसिंहजी धाकड

कुशल नेतृत्व के पर्याय समर्पित समाजसेवी सुश्रावक श्री वीरेंद्रसिंहजी धाकड का जीवन संघर्ष, परिश्रम और बहुविध सफलताओं की प्रेरक दास्तान है | मूलतः रामपुरा निवासी विधि में स्नातक (एलएल.बी.) श्री वीरेंद्रसिंहजी की पूज्य माता सुश्राविका श्रीमती सम्पतदेवी धाकड़ एक धर्मपरायण, अत्यंत विनम्र एवं दयालु स्वभाव की महिला थी। आपके पूज्य पिता सुश्रावक श्री तेजमलजी धाकड़ विख्यात समाजसेवी रहे। वे रामपुरा जैन समाज के जीवनपर्यन्त मंत्री रहने के साथ ही अनेक सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं के मुख्य पदाधिकारी, मार्गदर्शक और संपोषक रहे।

आपका पूरा कुटुम्ब पूज्य गुरुदेव जैन दिवाकर श्री चौथमलजी महाराज के प्रति अनन्य आस्थावान रहा है। फलतः आपको सहज ही बीसवीं सदी के महान प्रभावक श्रमणवर श्री जैन दिवाकरजी के प्रत्यक्ष दर्शन और चरण-स्पर्श का सौभाग्य मिला। सम्यक् श्रद्धा, सेवा, साधना, नेतृत्व और परोपकार के संस्कार आपको विरासत में मिले।

मातृभूमि की सेवा:

विरासत में प्राप्त सुसंस्कारों को आपने अपने जीवन में अपनाया और उन्हें अनेक आयामों में आगे बढ़ाया। आप अनेक वर्षों तक अपने पैतृक नगर स्थित रामपुरा महाविद्यालय के अध्यक्ष एवं रामपुरा जैन समाज के मंत्री रहे। आपके संयोजकत्व में रामपुरा के मुख्य श्राविका स्थानक ‘चन्दनबाला भवन’ का नवनिर्माण हुआ। रामपुरा में आपके परिवार द्वारा प्रतिमाह पोलियो वैक्सीन का निःशुल्क वितरण किया जाता है। आपके परिवार द्वारा ही रामपुरा में असाध्य रोगो की आयुर्वेदिक दवाइयाँ भी परम्परागत रूप से मुफ्त प्रदान की जाती है। जननी और जन्मभूमि के प्रति आपका रचनात्मक लगाव प्रेरणादायी है।

वीरवाल प्रवृति में योगदान:

आपके पिताजी श्री तेजमलजी धाकड़, वीरवाल समाज की केन्द्रीय संस्था अखिल भारतीय अहिंसा प्रचारक जैन संघ, चित्तौड़गढ़ के यशस्वी अध्यक्ष रहे। पूज्य पिताजी ने जिस संस्था को अनमोल सेवाएँ दीं, उस संस्था में आपने भी विविध दायित्वों को निभाया है और वर्तमान में आप अहिंसा प्रचारक जैन संघ के कार्याध्यक्ष के रूप में सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। आपके कार्याध्यक्षीय काल में अहिंसा प्रचारक जैन संघ को मार्च-2015 में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित एक लाख रुपये के ‘आचार्य हस्ती अहिंसा अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। वीरवाल समाज की उज्ज्वल दीपशिखा पूज्या कमलामाताजी के साथ भी आपने वीरवाल प्रवृत्ति को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

संयम के अनुमोदक:

श्रमण संघ के महामंत्री रहे पूज्य श्री मोहनमुनिजी (काले डण्डे वाले) की भी आप पर असीम अनुकम्पा रही। पूज्य श्री मोहनमुनिजी ने समय-समय पर आपको अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक सामाजिक उत्तरदायित्व दिये, जिनमें दीक्षार्थी भाई-बहनों के परिवार से आज्ञा लाना एवं उन्हें सयंम के महापथ पर अग्रसर करने जैसे दायित्व भी सम्मिलित हैं। अनेक अवसरों पर संयम-स्थिरीकरण में भी आपकी सकारात्मक सफल भूमिका रही। ग्रहण किये हुए दायित्व को पूर्ण निष्ठा से निभाना और सम्बन्धित उद्देश्य को ऊँचाई देना आपका स्वभाव है।

जैन दिवाकर जन्मभूमि की सेवा:

पूज्य गुरुदेव जैन दिवाकर श्री चैथमलजी महाराज के प्रति आपकी असीम आस्था के कारण ही आपने वर्ष 1977-78 में दिवाकर जन्मभूमि नीमच को अपना कार्यक्षेत्र बनाया था। महान सद्गुरु जैन दिवाकरजी के प्रति अखण्ड आस्था का यह अनूठा उदाहरण है। प्रसिद्ध उद्योगपति जैन रत्न श्री सुगनमलजी भण्डारी ने आपको नीमच में जैन दिवाकर मुनि चौथमलजी धार्मिक ट्रस्ट का ट्रस्टी मनोनीत किया। लगभग आठ वर्ष तक आप नीमच जैन समाज के अध्यक्ष रहे। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में आपने स्थानक भवन के नवनिर्माण सहित अनेक अविस्मरणीय और स्थायी महत्व के कार्य करवाये।

श्री मोहनमुनिजी की प्रेरणा एवं आपके अथक प्रयासों से नीमच में जैन दिवाकर गुरु चौथमल पारमार्थिक टंस्ट द्वारा एक निःशुल्क पारमार्थिक चिकित्सालय प्रारंभ हुआ जो सुचारू ढंग से सतत सेवाएँ प्रदान कर रहा हैं। आपने नीमच में जैन दिवाकरजी की पुनीत स्मृति में एक सामुदायिक केन्द्र एवं डायलसिस सेंटर के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाई। आपने नीमच क्षेत्र के सभी गुरु-भाइयों को संघ से जोड़कर एकता, संगठन और रचनात्मकता की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की।

अनेक वर्षावासों में तथा अन्य समय में आपका नीमच स्थित मुख्य भवन भी धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। आप सुदीर्घ काल तक श्री जैन दिवाकर संगठन समिति के यशस्वी महामंत्री रहे। समिति के महामंत्री रहते हुए आपके संयोजन में वर्ष 2010-11 में उपाध्याय श्री मूलमूनिजी की पावन निश्रा में नीमच में श्री जैन दिवाकर सम्प्रदाय के समस्त साधु साध्वियों का बृहद् सम्मलेन आयोजित किया गया। आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, नीमच के संघचालक भी रहे।

जैन दिवाकर दीक्षाभूमि का विकास:

जैन दिवाकरजी की अनेक प्रेरक स्मृतियों, कालजयी कृतियों और उपयोगी प्रवृत्तियों के संरक्षण और प्रचार के लिए किये गये आपके कार्यों और उपलब्धियों की सूची बहुत लम्बी है। जैन दिवाकर जन्मभूमि के विकास के साथ ही जैन दिवाकर दीक्षाभूमि (बोलिया) के विकास के लिए भी आपने अविस्मरणीय कार्य किये हैं। बोलियावासियों और गुरुभक्तों के बीच एक चर्चा रहती है कि बोलिया में जैन दिवाकरजी का स्वयं का चातुर्मास नहीं हो सका था। इस अभाव की पूर्ति के रूप में जैन दिवाकरजी के सुशिष्य वरिष्ठ उपाध्याय श्री मूलमूनिजी ‘पथिक’ का वर्ष 2013 का चातुर्मास बोलिया में करवाया गया।

पूज्य उपाध्यायप्रवर के बोलिया चातुर्मास करवाने में आपकी सक्रिय भूमिका रही। चातुर्मास के पावन निमित्त से बोलिया श्रीसंघ ने जैन दिवाकर दीक्षा भूमि को तीर्थ के रूप में विकसित करने का संकल्प किया। श्री धाकड़ साहब इस सत्संकल्प को साकार करने में सर्वतोभावेन समर्पित रहे। इस क्रम में बोलिया में नवीन स्थानक भवन का निर्माण हुआ। इसके अलावा बोलिया के बाहर जैन दिवाकर दीक्षा भूमि तक पक्का सड़क मार्ग एवं बीच में पुलिया निर्माण के लिए मध्यप्रदेश शासन की स्वीकृति प्राप्त करने में आपने अहम् भूमिका का निर्वहन किया। आपके ही प्रयासों से बोलिया में जैन दिवाकर दीक्षाभूमि तक पहुँचने के मार्ग का नामकरण भी ‘जैन दिवाकर दीक्षाभूमि मार्ग’ करवाया गया, जो एक अविस्मरणीय उपलब्धि है।

अनूठा साहित्यानुराग:

साहित्य एवं साहित्यकारों के प्रति अगाध अनुराग रखने वाले श्री धाकड़ साहब ने जैन दिवाकरजी के साहित्य के पुनप्र्रकाशन में बहुत योगदान किया। पूज्य उपाध्याय श्री मुलमुनिजी की पावन प्रेरणा से जैन दिवाकर श्री चौथमलजी महाराज के समग्र साहित्य के प्रकाशन-कार्य में आप आधार स्तंभ रहे। यही नहीं, उन्होंने जैन दिवाकरजी की अनेक महत्वपूर्ण स्मृतियों, दुर्लभ पाण्डुलिपियों और अप्रकाशित साहित्य के संरक्षण, अनुसंधान और प्रकाशन की र्नइ कार्ययोजना भी समाज के समक्ष रखी है। इस अस्पर्शित किन्तु महत्वपूर्ण विषय की ओर सबका ध्यानाकर्षित करना आपकी दूरदर्शिता का द्योतक है। आपकी इस साहित्यानुरागी दृष्टि को साहित्यसेवी ‘दिवाकर-रत्न’ श्री विपिनजी जारोली ने कई बार रेखांकित किया था।

जीवदया, गोसेवा:

वर्तमान में आप सपरिवार इन्दौर में रह रहे हैं। आप जहाँ भी रहे या गये, वहाँ आपने अपने व्यक्तित्व, कृतित्व, नेतृत्व, सेवा, समर्पण, औदार्य , सौहार्द और व्यवहार-कुशलता की छाप छोड़ी है। शीर्ष राजनीतिज्ञों, समाजसेवियों, संतों, विद्वानों आदि सभी वर्गों के व्यक्तियों से आपकी गाढ़ मैत्री हैं। आपने अमेरिका, चीन, हांगकांग, जापान आदि अनेक देशों की यात्राएँ भी की है। अहिंसा, शाकाहार, प्राणीरक्षा, गोसेवा जैसे कार्यों में भी आपका प्रचुर योगदान रहा है। वर्तमान में आप अखिल भारतीय गोवंश संरक्षण परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में सेवाएँ दे रहे हैं एवं गोवंश संरक्षण और जीवदया हेतु उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।

विपुल सम्मान:

धर्मनिष्ठ, सेभाभावी माता-पिता के मंगल आशीर्वाद, देव-गुरु-धर्म की श्रद्धामय सतत आराधना तथा नीतिमय प्रखर पुरुषार्थ से आपने व्यावसायिक क्षेत्र में भी र्नइ ऊँचाइयों का स्पर्श किया है। ऐसा करके आपने अपने परिवार, समाज तथा र्नइ पीढ़ी को श्रद्धा और श्रम की महत्ता से अवगत कराया है। आपके इन्द्रधनुषी व्यक्तित्व, बहुआयामी कृतित्व और निष्ठापूर्ण सेवाओं का समय-समय पर मूल्यांकन भी हुआ है। आपको व्यवसाय और प्रबंधन में अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए तो समाजसेवा के क्षेत्र में भी। पिपलिया मण्डी समाज की ओर से आपको ‘समाज भूषण’ अलंकरण प्रदान किया गया। महासती श्री सत्यसाधनाजी के नीमच वर्षा वास-2007 में श्री कमला साधनोदय टंस्ट द्वारा आपको ‘समाजरत्न’ की सार्थक उपाधि से अलंकृत किया गया। इस क्रम में सन् 2014 में इन्दौर में आयोजित जैन दिवाकर जयंती समारोह में आपको धर्म और समाज की दीर्घकालीन उत्कृष्ट सेवाओं के लिए ‘जैन दिवाकर गुरु मोहन राष्ट्रीय अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।

सम्प्रति आप उपाध्यायप्रवर श्री मूलमुनिजी की प्रेरणा से बने अखिल भारतीय श्री भगवान जैन दिवाकर अहिंसा सेवा संघ चेरिटेबल टंस्ट के कार्याध्यक्ष के रूप में भी विविध सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। आपके सुस्वस्थ, सुदीर्घ, सक्रिय और साधनामय जीवन की हार्दिक मंगलकामनाएँ। आपका अनुभवपूर्ण मार्गदर्शन सबको सदैव मिलता रहे।

Life Story

समाज रत्त्न सुक्षाव श्री तेजमलजी धाकड़ रामपुरा के परिवार में रत्त्नगर्भा सुक्षाविका श्रीमती सम्पतबाई धाकड़ की कुक्षी से ३ अप्रैल १९४९ को पांचवें पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम वीरेन्द्रसिंह रखा गया |

माता पिता के आदर्श एंव धर्म मय संस्कारो ने बालक वीरेन्द्र को धर्म एंव व्यावहारिक ज्ञान विरासत में प्रदान किया व सभी पुत्र एंव पुत्रियों को उच्च शिक्षा हेतु प्रेरित करके सुशिक्षित बनाया | वीरेन्द्रसिंहजी छात्र जीवन से ही नेतृत्व करने की क्षमता रखते थे अतःछात्र जीवन में कॉलेज शिक्षा के साथ सन १९६८ -१९६९ में छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये व तभी कॉलेज में एन .सी .सी होती थी उसका सी सर्टिफिकेट भी लिया उसके पश्चात पिताजी की इक्षा के अनुसार विधि स्नातक भी १९७२ में किया परन्तु असमय पिताजी के स्वर्गवास (१-४-७३) के कारण वकालत का व्यवसाय नहीं करके माताश्री की आज्ञानुसार पैत्रीक व्यवसाय में लगे व माताजी पिताजी के आशीर्वाद ने व्यापार को नई ऊंचाईयो पर पहुंचाया |वीरेन्द्रसिंहजी के ९ भाई व २ बहनों का भरापुरा परिवार रहा आप से बड़े भी चार भाई सा है व छोटे भी चार भाई है व आपसे बड़ी दोनों बहनें है पिताजी के स्वर्गवास के बाद आपका विवाह २७-५-१९७३ को महाराष्ट्र निवासी सेठ श्री घोंडीरामजी कुमठधरण गांव वालो की पुत्री सौ.शकुंतलाजी के साथ संपन्न हुआ |आपकी एक पुत्री अ.सौ. नवप्रभा दिलीपजी सुराणा व दो पुत्र चि.गौतम व हर्ष है दोनों के विवाह होकर दोनों पुत्रो के एक एक पोत्र है व बेटी चि. नवप्रभा के दो पुत्र है | वीरेन्द्रजी नाना व दादा का सुख भी प्राप्त कर चुके है |सन १९८० तक रामपुरा (म.प्र) पैत्रीक गांव में रहकर व्यवसाय व खेती किया | सन १९७९ में अमेरिका यात्रा की व वंहा से लोटकर नये व्यवसाय ऑटो मोबाइल को चुना व नीमच को अपनी कर्मभूमि बनाया यंहा अपने लूना (काइनेटिक इंजीनियरिंग पुणे ) के अधिकृत डिलर रहे | आपकी व्यावसायिक क्षमता को देखते हुए काइनेटिक कंपनी ने मंदसौर ,रतलाम व चित्तौड़गढ़ में भी अधिकृत डिलर बनाकर व्यावसायिक क्षमताओ को आगे बढ़ाने का अवसर दिया | काइनेटिक ने जब १९८५ में एक ऑटोमेटिक स्कूटर बनाया जिसका नाम काइनेटिक हौंडा था |

आपको (म .प्र) में ९ डिलर में से एक डिलर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | सन १९९२ में बेस्ट डिलर ऑफ़ काइनेटिक हौंडा के सम्मान से नवाज़ा गया व आपको सम्पूर्ण भारत में २२ डिलरो के साथ व म.प्र के दो डिलरो में एक आप स्वयं जापान जाने का अवसर प्रदान किया |

सन १९९५ में बजाज टेम्पो की डिलरशिप लेकर चार पहिया वाहनका व्यवसाय नीमच में बढ़ाया |१९८७ से १९९५ तक नीमच छावनी श्रीसंघ के अध्यक्ष रहे व आपके कार्यालय में स्थानक भवन दो मंजिला बनकर तैयार हुआ | इंदिरा गाँधी के आपातकाल १९७५ में आप रामपुरा ही रहे व विद्यार्थी जीवन से ही R.S.S व का काम करते थे तो मीसा में बंद करने के लिये कई बार पुलिस थाने पर ले गये परन्तु आप के आराध्य गुरुदेव पू जैन दिवाकर चौथमलजी मा.सा. को याद करके पुलिस थाने पर जाते तो पुलिस कहती आज तो आप वापस घर जाओ इस प्रकार इतने काले कानून ने भी आपकी द्रणनिष्ठा देव गुरु धर्म पर रही व आज भी है | अपने जीवन में नोतप की तपस्या की है व आप अपने आराध्य गुरुदेव जैन दिवाकरजी के प्रति पूर्ण निष्ठा व लगन से समर्पित है | वर्तमान में उपाध्याय श्री पू.मूलचंदजी मा.सा. के आशीर्वाद एवं मार्ग दर्शन में गुरुदेव के कार्यो में कार्यो में लगे हुए है बोलिया जैन दिवाकरजी की दीक्षा भुमि गांव से २ कि.मी. दूर है रास्ते में नदी भी आती है | पू.गुरुदेव की कृपा से म.प्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मा.शिवराजजी से पुलिया एवं सड़क स्वीकृत करवाकर व उस का नामकरण भी जैन दिवाकर दिक्षा भुमि मार्ग करवाकर पूर्ण हुआ | बोलिया में स्थानक भवन का भी निर्माण हुआ जिसका विभिन्न संस्थाओ व लोगो से दान लेकर कार्य को पूर्ण करवाया |

कोटा जैन दिवाकरजी की पुण्य भुमि है उस का भी उपाध्याय पू.श्री मुलमुनिजी उप- प्रवर्तक राकेशमुनिजी के आशीर्वाद से जैन दिवाकर पावनतीर्थ कोटा का निर्माण करवाने में तन मन धन से समर्पित जैन दिवाकरजी के साहित्य का पूनः प्रकाशन हो रहा है वह भी आप ही के नेतृत्व में इंदौर से ही हो रहा है |

अनेक प्रकार के ट्रस्ट के माध्यम से विभिन्न स्वाधर्मी सहायता जैन धर्म का प्रचार प्रसार ,साधुसंतो का वैयावच्छ इत्यादी दो कार्य किये जा रहे है| साप्ताहिक आयबिल तप की आराधना कर रहे है नियमित सामाजिक स्वाध्याय एवं पर्युषण पर्व में विशेष तप आराधना करते रहे है अठठाई तेला सहित अनेक तप कई बार किये |

सन १९७५ में रामपुरा में धार्मिक आराधना हेतु महिलाओ के स्थानक की कमी थी उसके भी संयोजक बने व स्थानक चन्दनबाला भवन आपही के प्रयासों से पूर्ण हुआ उसका मुख्य प्रवचन हॉल बनवाने में भी आपके परिवार की प्रमुख भूमिका रही है|

कुछ स्मृतियां

पू. पिताश्री तेजमलजी धाकड़ के संस्कार की झलकियां

हमारे नो भाईयों का भरापुरा परिवार है पू. पिताजी को कुछ लोगों ने जो पिताजी के मित्र हुआ करते थे कहा की आपका कपड़े का व्यवसाय तो बहुत अच्छा चल रहा है आपके एक पुत्र को मेडिकल स्टोर लगवा दो तो पू.पिताजी ने उन्ही से प्रति प्रश्न किया कि जो भी व्यापारी अपने व्यवसाय स्थल पर जाता है तो सबसे पहले प्रभु से प्रार्थना करता है कि मेरा व्यवसाय अच्छा चले तो मेडिकल स्टोर कब अच्छा चलेगा जब लोग बीमार हो तो ये व्यापार मेरे विचार से उपयुक्त नहीं है क्यूंकि इन बच्चों के विचारो में मलिनता आएगी किसी परिवार का रोगी बीमार है दवाई के पैसे नहीं है तो ये उसे यही कहेंगे कि तेरे सरीखे कई उधार ले गये आज तक नहीं दिये इस लिये उधार नहीं दूंगा उधर उसका परिजन मृत शय्या पर है ओर ये पैसे डूबजाय इस विचार से उधार नहीं देंगे तो यह विचारो मे निष्ठुरता आती जायगी व करुणा दया धर्म धीरे धीरे खत्म हो जायगा | इसके विपरित यदि किसी को कपड़ा उधार नहीं दिया तो वह कपड़े को सिलकर थेगला लगा कर काम चला लेंगे उसका कोई मरने वाला नहीं है |

अतःमेडिकल स्टोर नहीं लगाना ये संस्कार आज भी हम सभी भाईयों व हमारे बच्चों मे स्थायी रूप से है |

(२)

हमारे पैतृक गॉँव रामपुरा मे एक मात्र सिनेमा टॉकीज़ था वह बिक रहा था व उसकी जितनी कीमत मांगी जा रही थी वह भी वाज़िब कीमत थी मैने पू.पिताजी को प्रस्ताव रखा कि यह श्री कृष्णा टॉकीज़ अपन खरीद लेते है तो उन्होंने कहा कि यह व्यवसाय अपने परिवार के योग्य नहीं है इस व्यवसाय मे गुंडे बदमाशों को पालना पड़ता है आये दिन झगडे होते है व दुव्यर्सनों मे उलझ जाते है तुम्हे जो मैने संस्कार दिये है यह उसके विपरित व्यवसाय है अपने को नहीं करना हमने विचार त्याग दिया व आज भी उसी आदर्श पर चल रहे है |

(३)

रामपुरा मे हम रासायनिक खाद के डिलर थे तब एक पेस्टी साइड कंपनी का प्रतिनिधि हमे डिलर बनाने आया तो पू.पिताजी ने उसकी बाते सुनने के बाद कहा की पेस्टी साइड यानि की कीड़ो को मारने की दवाई है नहीं हम यह पाप का काम नहीं करेंगे मे अपने खेतों मे भी कीड़ा मार दवा नहीं डालने देता हूँ अतः आप क्षमा करे उनका यही कहना था की अपन जो भी व्यापार करे वह बहुजन हिताय बहुजन सुखाय हो |

हम लोग आज तक उसी नियम मर्यादा का पालन कर रहे है |

Precious photos with Maharana Sahab Mahendra Singh Ji

Some Precious Moments